ग़ज़ल : कोई खास नहीं
कोई पूछे अगर तुमसे,
कह देना—कोई खास नहीं
मैं बस एक गुज़रता लम्हा हूँ,
ठहरा—कोई खास नहीं
कभी धूप की नरमी बन जाऊँ,
कभी ठंडी-सी छाँह सही
जो छूकर आगे बढ़ जाए,
वही रिश्ता—कोई खास नहीं
अधूरी बातों, आधे वादों की,
एक हल्की-सी परछाईं हूँ
जो कह न सको, जो भूल सको,
वो किस्सा—कोई खास नहीं
मैं राह का ऐसा मोड़ बना,
जहाँ रुकना भी आदत न हो
जो संग चला पर साथ न रहा,
वो साथी—कोई खास नहीं
यादों की धुंध में चेहरा-सा,
तसव्वुर में बसता रहता
जो दिखता है पर मिलता नहीं,
वो चेहरा—कोई खास नहीं
ना दावा कोई, ना शिकवा है,
ना शिकस्त, ना कोई जीत
जो समझ लिया तो अपना है,
वरना—कोई खास नहीं
ये 'राज़' बस इतना कहकर,
टाल देता है हर सवाल
मेरी हर पहचान के आगे,
लिख देना—कोई खास नहीं
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✍️ RKP

