वक्त से मुलाकात:-
**राह में आज वक़्त से यूँ मुलाक़ात हुई,**
उसने मुस्कुराकर मेरी तरफ़ एक बात कही।
बोला—
"मुझे बाँधने की कोशिश मत करना,
मैं नदी हूँ, ठहरना मेरी फ़ितरत नहीं।"
मैंने हँसकर उससे इतना ही पूछा—
"फिर तेरे साथ कैसे चला जाए?"
वक़्त बोला—
"हर पल को जीना सीख ले,
मंज़िल से पहले सफ़र को अपना बना ले।"
मैंने कहा—
"अभी तो दिल में बच्चे की शरारत है,
कुछ अधूरे ख़्वाब हैं, कुछ भोली सी चाहत है।
कैसे ओढ़ लूँ दुनियादारी की चादर,
जब रूह को अब भी मासूमियत की आदत है।"
वक़्त मुस्कुराया और चुपचाप बढ़ गया,
मैं उसकी ख़ामोशी का मतलब पढ़ गया।
समझ आया—
न कोई रिश्ता हमेशा साथ चलता है,
न कोई मौसम उम्र भर ठहरता है।
जो मिला है उसे दिल से संजो लेना,
जो बिछड़ जाए उसे दुआ देकर विदा कर देना।
आख़िर हम सब इस जीवन-पथ के राही हैं,
कुछ पल की कहानी हैं, कुछ साँसों की गवाही हैं।
जब सफ़र पूरा होगा,
नाम नहीं, व्यवहार याद आएगा;
दौलत नहीं, अपनापन मुस्कुराएगा।
इसलिए
हर सुबह किसी के चेहरे की वजह बनो,
हर शाम अपने मन से सुलह करके सो।
**ज़िंदगी मंज़िल नहीं, एक खूबसूरत सफ़र है,
जो प्रेम बाँट गया वही सच में अमर है।**
©RKP
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